आज फिर पुछा मेरे चाहने वालो ने,
क्या दिल तोडा है तेरा कभी किसी खुदगर्ज ने,
ऐसा क्या दिखता है मेरी कविताओ मे,
जो मुझे ये लोग दिलजला आशिक समझ बेठे है,
बताओ जरा किस किताब मे लिखा है ऐसा,
की दिल की बातो को बाया करने के लिए जरुरी है दिल टूटना,
लोग कहते है आखिर किसके लिए लिखता है ये सब,
मैंने मुश्कुरा के कहाँ खुद के सुकून के लिए लिखता हूँ बस,
होते है बस अल्फाज़ा मेरे इन कविताओ मे,
पर नाइंसाफी है की मालिक किसी और को समझा जाता है इनका,
समझ नहीं आता की कैसे समझाऊ मैं इन सब को,
की आज भी तलाश है इन कविताओ को बस एक अनजान सी मंजिल की...

i can see the honesty.
ReplyDeleteThanks Dileep Bhai :)
ReplyDeletelogo se tang akar finaly unhe samjane k lie ye poem ..... bdiya h samj sakte h hm...
ReplyDeletehehehe :D nahi nahi bas sachai baya karne ki koshish ki hai usme tang ane wali kya baat ...and by the everyone has rights to say whatever they think :)
ReplyDelete